योजना :
कम से कम १० बार ऐसा हुआ कि हरिश्चन्द्रगढ़ का ट्रेक करने का प्लान बनता और आखिरी लम्हों में पता नहीं कुछ ऐसा हो जाता कि प्लान धरा का धरा रह जाता | यहाँ तक कि ऐसा लगने लगा था कि शायद हम कभी जा पायें या नहीं | इस बार सोमवार की छुट्टी थी और ३ दिन का सप्ताहान्त मिल गया | बहुत दिनों से मन था कि २-३ दिन का ट्रेक किया जाये ताकि मुंबई के कोलाहल से दूर प्रकृति के सुखद अनुभव को लिया जाये | यह सोचकर हमने ३ दिन का रतनगढ़ से हरिश्चन्द्रगढ़ का ट्रेक प्लान किया | तीन दिनों तक गाँव और जंगलों में चलना था और गुफाओं में बसेरा करना था | संतोष को किसी काम की वजह से अपने घर (हैदराबाद) जाना पड़ गया तो हम ३ लोग : मयंक , सौरभ और मैं इस ट्रेक के लिए तैयार थे | साथ ही इस बार हमारे ऑफिस के ही मेनेजर साहब (अभिषेक ) भी हमारे साथ चलने के इच्छुक थे तो अब हम चार लोग शुक्रवार का इंतज़ार करने लगे |
रतनगढ़ :

सह्याद्रि पर्वत श्रंखला की सबसे ऊँची चोटियाँ इगतपुरी खण्ड में आती हैं | इसके बाद सह्याद्रि का विस्तार कर्जत से होते हुए पुणे और फिर कोंकण तक है | भन्डारधारा झील के पास स्थित रतनगढ़ ट्रेकर्स को अपने सुन्दर दृश्यों की वजह से बहुत आकर्षित करती है | यहाँ की देवी रत्नेश्वरी देवी के नाम पर इस किले का नाम रतनगढ़ पड़ा | इस किले को छत्रपति शिवाजी ने अपने कब्जे में कर लिया था और यह उनके कुछ प्रिय किलों में से एक था | इस चोटी से चारों तरफ के आकर्षक दृश्य आपके सामने होते हैं | यहाँ से सह्याद्रि की सबसे ऊँची चोटी कलसुबाई और उससे लगी हुई कुलांग-मदान-अलांग चोटियाँ भी पास ही हैं |
हरिश्चन्द्रगढ़ :

हरिश्चन्द्रगढ़ की गणना बहुत प्राचीन किलों में होती है |बहुत से पुराणों (मत्स्यपुराण , अग्निपुराण , और स्कन्दपुराण आदि) में इसका उल्लेख मिलता है | इस किले को छठी शताब्दी में कलचुरी वंश के शासनकाल में बना हुआ माना जाता है | बहुत सी गुफाएं ११वीं शताब्दी में बनी हुई मानी गई हैं | गुफाओं में भगवान विष्णु की मूर्तियाँ हैं | यहाँ के विविध निर्माण इसके बाद यहाँ विभिन्न संस्कृतियों के आगमन को दर्शाते हैं | खीरेश्वर गाँव में नागेश्वर मंदिर , हरिश्चंद्रेश्वर मंदिर और केदारेश्वर गुफा में बनी अनुकृतियाँ इस किले को मध्यकालीन समय का बताती हैं | इसके बाद यह किला मुगलों के नियंत्रण में था जिसे मराठा वंश ने सन १७४७ में अपने नियंत्रण में ले लिया |
इस एतिहासिक महत्व के साथ ही यहाँ और भी जगहें बहुत प्रसिद्ध हैं : कोंकण काड़ा , तारामती चोटी, केदारेश्वर गुफा ,हरिश्चंद्रेश्वर मंदिर आदि |
हमारे बस/ट्रेक का मार्ग इस प्रकार था :
मुंबई - इगतपुरी - घोटी - शेंडी गाँव - भन्डारधारा झील - (ट्रेक प्रारंभ )रतन वाड़ी गाँव - रतनगढ़- कटारबाई खिंड (दर्रा / पास )- कुमशेट गाँव - पछेती वाड़ी गाँव - पाचनै गाँव - हरिश्चन्द्रगढ़ - खीरेश्वर गाँव - खूबी फाटा (ट्रेक सम्पूर्ण )- कल्याण - मुंबई |
मुंबई से शेंडी गाँव :
इन्टरनेट पर मिली जानकारी के आधार पर हम लोगों ने पहले महानगरी एक्सप्रेस जो कि रात को १२ बजे मुंबई से चलती
है से इगतपुरी निकलने का विचार बनाया | परन्तु जब में इगतपुरी से बस की समय सारिणी देख रहा था तो मुझे संगमनेर की बस का पता चला | मेरी जानकारी के अनुसार हमे इगतपुरी से शेंडी जाने के लिए पुणे की बस पकड़नी थी जो संगमनेर से हो कर जाती है | जब मुझे मुंबई से संगमनेर की बस दिखी तो हमने इसी से निकलने का प्लान बना लिया | करीब ११ बजे रात को हम खाना खाने के बाद महाराष्ट्र राज्य परिवहन के मुंबई सेंट्रल डिपो की तरफ चल पड़े | यहाँ जा कर पता चला की १२ और १ बजे संगमनेर की बसें हैं | १२ बजे वाली बस में बैठने के बाद पता चला कि ये बस तो शेंडी होकर नहीं जायेगी | यह नॉन स्टाप बस है जो नासिक से होते हुए संगमनेर जायेगी | इगतपुरी के अन्दर भी नहीं जायेगी बल्कि बाई पास से निकल जायेगी | अब किसी ने बताया कि १ बजे वाली बस इगतपुरी होकर जाती है | लेकिन १ बजे वाली बस का भी यही मार्ग था |
इस बस के कंडक्टर ने बताया कि वो हमको इगतपुरी के बाहर ही महामार्ग पर उतार देगा जहाँ से हम पुणे वाली बस पकड़ सकते हैं | यही एक मात्र विकल्प था इसलिए इसी बस में बैठ गए | इस बस का कंडक्टर ने थोडा सोचकर हमको दूसरा उपाय बताया कि हम घोटी के पास उतार सकते हैं | घोटी इगतपुरी से थोडा आगे एक छोटी सी जगह है जो पुणे इगतपुरी मार्ग पर है | चूँकि रात में पुणे वाली बस महामार्ग पर रुके या न रुके इसलिए हमने भी ये उचित समझा | १ बजे मुंबई से निकल कर हम ५ बजे घोटी के पास उतर गए | कंडक्टर ने हमको एक शार्टकट रास्ता बता दिया था परन्तु अँधेरे और नयी जगह की वजह से हम ज्यादा समझ नहीं पाए | यहाँ उतर कर थोडा पीछे वापस आये और घोटी के लिए सड़क से ही चल पड़े | १.५ किलोमीटर करीब चले होंगे और हम घोटी में थे और समय ५:४५ हो चुका था | पुणे की पहली बस इगतपुरी से ५:३० पर निकलती है जो थोडी ही देर में आ गई | यहाँ से ६ बजे हमने शेंडी के लिए यात्रा शुरू की और करीब ७:३० पर हम शेंडी गाँव पहुँच गए |
पहला दिन : शेंडी गाँव से प्रस्थान :
शेंडी गाँव में चाय पीने के बाद पूछने पर पता चला की यहाँ से नाव या जीप से रतन वाड़ी तक पहुंचा जा सकता है |
सुबह सुबह सबका मन झील से हो कर जाने का था इसलिए एक नाव वाले से बात की तो उसने बताया की उसको १० लोग चाहिए तब वो चलेगा | लेकिन हम तो ४ ही थे | जीप भी पूरी बुकिंग पर ही जा रही थी | उसने हमको झील के किनारे इन्तेज़ार करने को बोला और कहा की और लोग मिलेंगे तो वो ले कर आएगा | नाव का किराया मात्र ६० रूपये प्रति व्यक्ति है |
भन्डारधारा झील:

यहाँ से आधा किलोमीटर दूर है भन्डारधारा झील | प्रवरा नदी पर सन १९१० में बना हुआ यह बाँध, विल्सन बाँध भारत
के कुछ सबसे पुराने बांधों में से एक है | भन्डारधारा झील को ऑर्थर लेक भी कहा जाता है | एकदम साफ़ पानी की इस विशालकाय झील की परिधि करीबन ४५ किलोमीटर है | साथ ही यहाँ पर स्थित रांधा झरने को भारत का
तीसरा सबसे बड़ा झरना मान जाता है |इस झील के चारों तरफ रतनगढ़ , कलसुबाई , कुलांग-मदान-अलांग , अजूबा और घनचक्कर आदि चोटियों का दृश्य बड़ा ही सुन्दर होता है | हमे इस झील को पार कर रतन वाड़ी पहुँचने के लिए झील में नाव से १० किलोमीटर दूरी तय करनी थी |
बहुत देर तक झील के किनारे बैठे रहे और फोटोग्राफी करते रहे | लेकिन अब तक वो नाव वाला नहीं आया था | आखिर
में खुद जा कर उसको खोजा तो पता चला कि उसको कोई और सवारी नहीं मिली | आखिर में ५०० रूपये में बात तय हुई और हम चारों चल पड़े नावकी तरफ |
रतन वाड़ी :
नाव से यह १० किलोमीटर की दूरी तय करना बड़ा ही सुकून भरा अनुभव था | सुबह के सूरज की किरणे , नीला स्वच्छ पानी और वो ताज़ी हवाएं किसी के भी मन को आह्लादित करने के लिए बहुत हैं | नाव वाला बता भी रहा था कि चारों
तरफ कौन कौन सी चोटियाँ दिख रही हैं | लगभग १ घंटे में हम लोग झील के उस पार पहुँच गए | यहाँ पर छोटा सा गाँव
था (शायद रतन वाड़ी का एक हिस्सा ) और यहाँ से हम आगे बढ़ चले | थोडी देर चलने के बाद ही हमको मुख्य रतन वाड़ी गाँव दिखने लगा | अभी तक हम इस विशाल झील के किनारे किनारे ही चल रहे थे | ११ बज चुका था और सामने रतनगढ़ दिख रहा था | यहाँ पर
थोडा रूककर फिर आगे बढ़ने की सोची | बैग रखने के बाद इन सुन्दर दृश्यों का आनंद लिया और फोटोग्राफी की | इतनी देर तक इतने साफ़ पानी की झील के करीब हों और झील में न घुसें , ऐसा कैसे हो सकता है | एक एक कर के सब झील में घुस गए और फिर ठंडे पानी में अठखेलियों का दौर शुरू हो गया |
अमृतेश्वर मंदिर :

बहुत देर तक यहाँ नहाने के बाद अब सब लोग तारो ताज़ा हो चुके थे और गाँव की तरफ बढे | गाँव के किनारे पर पहुत
पुराना अमृतेश्वर महादेव का मंदिर है | मंदिर की दीवारों पर पत्थरों पर सुन्दर शिल्प कला ने सबका मन अभिभूत कर दिया | यहाँ पर शिवलिंग जमीन से नीचे है जो पानी में डूबा हुआ था | अन्दर थोडा अँधेरा सा था और ३-४ सीढियां उतरने के बाद और गहराई का अंदाजा नहीं था
तो थोड़े से दिख रहे शिवलिंग के दर्शन किये और वापस आ गए | मंदिर के पास ही एक चाय की दुकान थी यहाँ पर स्वादिष्ट कांदा पोहा खाया , चाय पी और अब ट्रेक का प्रारंभ करना था | यहाँ से रतनगढ़ का ट्रेक कुछ ३-४ घंटे का है | १२ बज चुका था और हमारी अगली मंजिल थी रतनगढ़ |
यहाँ से एक छोटी सी नदी के किनारे किनारे थोडी दूर तक चलना था | लेकिन अब समझ नहीं आ रहा था की नदी के
किस तरफ से जाना है | दोनों तरफ रास्ते थे | थोडी दूर चल कर एक घर दिखा | यहाँ से सही रास्ता पता चल गया | दरअसल हमको नदी को पार कर के फिर
दायीं तरफ चलते जाना था | थोडा आगे चलने पर गाँव का एक लड़का मिल गया जो जंगल में गाय चराने आया था | उसके साथ थोडा उपर चढ़ने के बाद सीधा
रास्ता मिल गया था | अब जंगलों से होते हुए चढाई वाला रास्ता था | करीब दो घंटे चलने के बाद एक जगह फाटा (जहाँ से दो रास्ते हो जाते हैं ) मिल गया | हमारे ज्ञान के मुताबिक ये दूसरा रास्ता हरिश्चन्द्रगढ़ जाता था जिसे हमको अगले दिन पकड़ना था | यहाँ पर कुछ और लोग मिले जो गाँव से किसी गाइड को ले कर आ रहे थे | उसने भी बता दिया कि यह हरिश्चन्द्रगढ़ के लिए रास्ता था | हम सीधा उपर चल पड़े |
रतनगढ़ के लिए सीढियां :

करीब १ घंटा और चढ़ने के बाद हम रतन गढ़ के ठीक नीचे थे | यहाँ से सीधी चट्टान थी और इस पर लोहे ही सीढियां
लगी हुई थी क्योंकि ऐसे चट्टान पर चढ़ना असंभव था | यहाँ अभिषेक की हालत ख़राब हो गई | इन सीढियों पर आधे के बाद रेलिंग नहीं थी और जो थी भी वो हिल रही थी | करीबन ३०-३० सीढियां दो जगह थी और उसके बीच का रास्ता चट्टान का खतरनाक रास्ता था | खैर
अभिषेक को धीरे धीरे उपर चढाया और मैं दोबारा नीचे उतर कर उसका बैग ले के उपर गया | इसके बाद दूसरी सीढ़ी थी जो धीरे धीरे पार कर ली | इसके उपर का रास्ता चट्टान में बने छोटे छोटे खांचों पर चढ़ना था | थोडा सा चढ़ कर एक दरवाजा मिल गया | यहाँ से दायीं तरफ जा कर गुफाएं मिल जाती हैं |
हमारे पीछे पीछे गाइड भी बाकी लोगों को ले कर आ गया | पहली गुफा छोटी सी थी और इसमें मंदिर भी था | गाइड के कहने के मुताबिक हम चार लोग इसमें रुक गए और दूसरे लोग अगली बड़ी गुफा में |
अब रात में रुकने के लिए लकडी का इन्तेजाम करना था | हमारा मन था की रात भर आग जला के बैठेंगे क्योंकि छोटी पर रात में तेज़ हवाएं चलेंगी और ठंडा हो जायेगा | उनके साथ आया गाइड कहीं से थोडी लकडियाँ ले आया और हमको भी दे दी |
जैसा कि लोगों ने बताया था रतनगढ़ से हरिश्चन्द्रगढ़ का ट्रेक करीब १२ घंटे का है | सुबह जल्दी निकल कर शाम को ही पहुंचा जा सकता है और अगर रास्ता भटक गए तो फिर मुश्किल हो जायेगी | सामने के जंगल देख कर लग भी रहा था कि रास्ता भटकने की सम्भावना बहुत है | हमने इस गाइड से बात की तो उसने बताया की वो चलेगा परन्तु ७०० रूपये
लेगा | हमको थोडा ज्यादा लगा और हमारी बात नहीं बन पायी | फिर हमने अकेले ही जाने का निर्णय लिया | अब लकडी जलाई गई और गरमागरम चाय पीने के बाद समय था रतनगढ़ घूमने का |
रतनगढ़ में :
चाय पी कर मैं, सौरभ और मयंक उपर की तरफ चल पड़े | चूँकि बंदरों का भय था इसलिए दो दो करके जाना था |
उपर बरसात के पानी को इकठ्ठा करने की टंकियां बनी हुई थी | यहाँ से पानी भर लिया जिससे रात में दुबारा न आना पड़े | रतनगढ़ में किले के कुछ अवशेष अभी भी बचे हुए हैं | उपर रास्ता बिलकुल चट्टान के किनारे पर है और सूखी हुई घास में कुछ खास नहीं दिख रहा था | संभल संभल कर ही चलना था | कहीं कुछ लकडियाँ दिख रही थी तो वो उठा ले रहे थे | बहुत दूर चलने के बाद अब हमें लगा कि आगे कुछ नहीं होगा इसलिए वापस आ गए |
गुफा में वापस आ कर कुछ देर बैठे और अब सूर्यास्त का समय होने लगा था | अब सौरभ गुफा में रुका और हम तीनो उपर की तरफ चल दिए | एक जगह बैठ कर सूर्यास्त के सुन्दर दृश्यों का आनंद लिया |
जब इतनी ऊंचाई पर इतनी मेहनत से चढ़े हों तो फिर सामने के दृश्यों की सुन्दरता कुछ और ही लगती है | इतनी ऊंचाई से सामने के सुन्दर दृश्य और डूबता सूरज | अब पहाडी की दूसरी तरफ चल पड़े | अँधेरा होने लगा था लेकिन दूसरी तरफ कल्याण दरवाज़े तक जाना था | ये रास्ता भी बिलकुल किनारे पर था और हम गुफाओं के ठीक उपर चल रहे थे | अभिषेक के कहने पर हम लोगों ने वापस जाने का निर्णय लिया और गुफा में आ गए | गुफा के बाहर ही
आग जलाई और अब खाना बनाने का कार्यक्रम शुरू करना था | पुलाव बनाने का सामान ले कर ही आये थे | मयंक शकरकंद भी ले कर आ गया था | कई सालों बाद आग में भूनी हुई शकरकंद खा कर तो सब तृप्त हो गए | करीब १० बजे स्वादिष्ट पुलाव खाया| अब बाहर ठंडा होने लगा था इसलिए गुफा के अन्दर ही आग जला ली | अब गुफा के अन्दर सोने का प्रबंध किया और अगले दिन के रोमांच और भय की कल्पना के साथ हंसते हंसाते सबको नींद आ गयी |
नोट : चूँकि एक साथ बहुत लम्बा वृत्तान्त हो जाएगा इसलिए अगले दो दिनों का वृत्तान्त अगले भाग में लिखूंगा |
कम से कम १० बार ऐसा हुआ कि हरिश्चन्द्रगढ़ का ट्रेक करने का प्लान बनता और आखिरी लम्हों में पता नहीं कुछ ऐसा हो जाता कि प्लान धरा का धरा रह जाता | यहाँ तक कि ऐसा लगने लगा था कि शायद हम कभी जा पायें या नहीं | इस बार सोमवार की छुट्टी थी और ३ दिन का सप्ताहान्त मिल गया | बहुत दिनों से मन था कि २-३ दिन का ट्रेक किया जाये ताकि मुंबई के कोलाहल से दूर प्रकृति के सुखद अनुभव को लिया जाये | यह सोचकर हमने ३ दिन का रतनगढ़ से हरिश्चन्द्रगढ़ का ट्रेक प्लान किया | तीन दिनों तक गाँव और जंगलों में चलना था और गुफाओं में बसेरा करना था | संतोष को किसी काम की वजह से अपने घर (हैदराबाद) जाना पड़ गया तो हम ३ लोग : मयंक , सौरभ और मैं इस ट्रेक के लिए तैयार थे | साथ ही इस बार हमारे ऑफिस के ही मेनेजर साहब (अभिषेक ) भी हमारे साथ चलने के इच्छुक थे तो अब हम चार लोग शुक्रवार का इंतज़ार करने लगे |
रतनगढ़ :
सह्याद्रि पर्वत श्रंखला की सबसे ऊँची चोटियाँ इगतपुरी खण्ड में आती हैं | इसके बाद सह्याद्रि का विस्तार कर्जत से होते हुए पुणे और फिर कोंकण तक है | भन्डारधारा झील के पास स्थित रतनगढ़ ट्रेकर्स को अपने सुन्दर दृश्यों की वजह से बहुत आकर्षित करती है | यहाँ की देवी रत्नेश्वरी देवी के नाम पर इस किले का नाम रतनगढ़ पड़ा | इस किले को छत्रपति शिवाजी ने अपने कब्जे में कर लिया था और यह उनके कुछ प्रिय किलों में से एक था | इस चोटी से चारों तरफ के आकर्षक दृश्य आपके सामने होते हैं | यहाँ से सह्याद्रि की सबसे ऊँची चोटी कलसुबाई और उससे लगी हुई कुलांग-मदान-अलांग चोटियाँ भी पास ही हैं |
हरिश्चन्द्रगढ़ :
हरिश्चन्द्रगढ़ की गणना बहुत प्राचीन किलों में होती है |बहुत से पुराणों (मत्स्यपुराण , अग्निपुराण , और स्कन्दपुराण आदि) में इसका उल्लेख मिलता है | इस किले को छठी शताब्दी में कलचुरी वंश के शासनकाल में बना हुआ माना जाता है | बहुत सी गुफाएं ११वीं शताब्दी में बनी हुई मानी गई हैं | गुफाओं में भगवान विष्णु की मूर्तियाँ हैं | यहाँ के विविध निर्माण इसके बाद यहाँ विभिन्न संस्कृतियों के आगमन को दर्शाते हैं | खीरेश्वर गाँव में नागेश्वर मंदिर , हरिश्चंद्रेश्वर मंदिर और केदारेश्वर गुफा में बनी अनुकृतियाँ इस किले को मध्यकालीन समय का बताती हैं | इसके बाद यह किला मुगलों के नियंत्रण में था जिसे मराठा वंश ने सन १७४७ में अपने नियंत्रण में ले लिया |
इस एतिहासिक महत्व के साथ ही यहाँ और भी जगहें बहुत प्रसिद्ध हैं : कोंकण काड़ा , तारामती चोटी, केदारेश्वर गुफा ,हरिश्चंद्रेश्वर मंदिर आदि |
हमारे बस/ट्रेक का मार्ग इस प्रकार था :
मुंबई - इगतपुरी - घोटी - शेंडी गाँव - भन्डारधारा झील - (ट्रेक प्रारंभ )रतन वाड़ी गाँव - रतनगढ़- कटारबाई खिंड (दर्रा / पास )- कुमशेट गाँव - पछेती वाड़ी गाँव - पाचनै गाँव - हरिश्चन्द्रगढ़ - खीरेश्वर गाँव - खूबी फाटा (ट्रेक सम्पूर्ण )- कल्याण - मुंबई |
मुंबई से शेंडी गाँव :
इन्टरनेट पर मिली जानकारी के आधार पर हम लोगों ने पहले महानगरी एक्सप्रेस जो कि रात को १२ बजे मुंबई से चलती
इस बस के कंडक्टर ने बताया कि वो हमको इगतपुरी के बाहर ही महामार्ग पर उतार देगा जहाँ से हम पुणे वाली बस पकड़ सकते हैं | यही एक मात्र विकल्प था इसलिए इसी बस में बैठ गए | इस बस का कंडक्टर ने थोडा सोचकर हमको दूसरा उपाय बताया कि हम घोटी के पास उतार सकते हैं | घोटी इगतपुरी से थोडा आगे एक छोटी सी जगह है जो पुणे इगतपुरी मार्ग पर है | चूँकि रात में पुणे वाली बस महामार्ग पर रुके या न रुके इसलिए हमने भी ये उचित समझा | १ बजे मुंबई से निकल कर हम ५ बजे घोटी के पास उतर गए | कंडक्टर ने हमको एक शार्टकट रास्ता बता दिया था परन्तु अँधेरे और नयी जगह की वजह से हम ज्यादा समझ नहीं पाए | यहाँ उतर कर थोडा पीछे वापस आये और घोटी के लिए सड़क से ही चल पड़े | १.५ किलोमीटर करीब चले होंगे और हम घोटी में थे और समय ५:४५ हो चुका था | पुणे की पहली बस इगतपुरी से ५:३० पर निकलती है जो थोडी ही देर में आ गई | यहाँ से ६ बजे हमने शेंडी के लिए यात्रा शुरू की और करीब ७:३० पर हम शेंडी गाँव पहुँच गए |
पहला दिन : शेंडी गाँव से प्रस्थान :
शेंडी गाँव में चाय पीने के बाद पूछने पर पता चला की यहाँ से नाव या जीप से रतन वाड़ी तक पहुंचा जा सकता है |
भन्डारधारा झील:
यहाँ से आधा किलोमीटर दूर है भन्डारधारा झील | प्रवरा नदी पर सन १९१० में बना हुआ यह बाँध, विल्सन बाँध भारत
बहुत देर तक झील के किनारे बैठे रहे और फोटोग्राफी करते रहे | लेकिन अब तक वो नाव वाला नहीं आया था | आखिर
रतन वाड़ी :
नाव से यह १० किलोमीटर की दूरी तय करना बड़ा ही सुकून भरा अनुभव था | सुबह के सूरज की किरणे , नीला स्वच्छ पानी और वो ताज़ी हवाएं किसी के भी मन को आह्लादित करने के लिए बहुत हैं | नाव वाला बता भी रहा था कि चारों
अमृतेश्वर मंदिर :
बहुत देर तक यहाँ नहाने के बाद अब सब लोग तारो ताज़ा हो चुके थे और गाँव की तरफ बढे | गाँव के किनारे पर पहुत
यहाँ से एक छोटी सी नदी के किनारे किनारे थोडी दूर तक चलना था | लेकिन अब समझ नहीं आ रहा था की नदी के
रतनगढ़ के लिए सीढियां :
करीब १ घंटा और चढ़ने के बाद हम रतन गढ़ के ठीक नीचे थे | यहाँ से सीधी चट्टान थी और इस पर लोहे ही सीढियां
हमारे पीछे पीछे गाइड भी बाकी लोगों को ले कर आ गया | पहली गुफा छोटी सी थी और इसमें मंदिर भी था | गाइड के कहने के मुताबिक हम चार लोग इसमें रुक गए और दूसरे लोग अगली बड़ी गुफा में |
जैसा कि लोगों ने बताया था रतनगढ़ से हरिश्चन्द्रगढ़ का ट्रेक करीब १२ घंटे का है | सुबह जल्दी निकल कर शाम को ही पहुंचा जा सकता है और अगर रास्ता भटक गए तो फिर मुश्किल हो जायेगी | सामने के जंगल देख कर लग भी रहा था कि रास्ता भटकने की सम्भावना बहुत है | हमने इस गाइड से बात की तो उसने बताया की वो चलेगा परन्तु ७०० रूपये
लेगा | हमको थोडा ज्यादा लगा और हमारी बात नहीं बन पायी | फिर हमने अकेले ही जाने का निर्णय लिया | अब लकडी जलाई गई और गरमागरम चाय पीने के बाद समय था रतनगढ़ घूमने का |
रतनगढ़ में :
चाय पी कर मैं, सौरभ और मयंक उपर की तरफ चल पड़े | चूँकि बंदरों का भय था इसलिए दो दो करके जाना था |
गुफा में वापस आ कर कुछ देर बैठे और अब सूर्यास्त का समय होने लगा था | अब सौरभ गुफा में रुका और हम तीनो उपर की तरफ चल दिए | एक जगह बैठ कर सूर्यास्त के सुन्दर दृश्यों का आनंद लिया |
नोट : चूँकि एक साथ बहुत लम्बा वृत्तान्त हो जाएगा इसलिए अगले दो दिनों का वृत्तान्त अगले भाग में लिखूंगा |


amazing...........jaankari bhi aur aapke saath ghoomne ka bhi anand